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समस्तीपुर में नाबालिग सूखे नशे और जुए की चपेट में, बढ़ती चोरियों पर चिंता

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समस्तीपुर। जिले के शहर और ग्रामीण इलाकों में तेजी से फैल रहा सूखा नशा और जुए की लत अब केवल सामाजिक चिंता नहीं, बल्कि नाबालिगों के भविष्य और जिले की कानून-व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती बनती जा रही है। हालात यह हैं कि स्कूलों के आसपास, चाय-पान की दुकानों, बस स्टैंड और भीड़-भाड़ वाले चौक-चौराहों पर नशे से जुड़ी सामग्री की सहज उपलब्धता ने एक पूरी पीढ़ी को जोखिम में डाल दिया है। स्थानीय स्तर पर मिल रही जानकारी के अनुसार कई नाबालिग अब सिगरेट में भरकर गांजा जैसे नशीले पदार्थों का इस्तेमाल कर रहे हैं, जो आगे चलकर चोरी, झपटमारी और छोटे अपराधों की ओर पहला कदम बनता जा रहा है। जानकार मानते हैं कि जिले में बढ़ रही छोटी-बड़ी चोरियों के पीछे यह भी एक अहम कारण बनकर उभर रहा है, जिस पर अब तक समग्र और प्रभावी कार्रवाई दिखाई नहीं देती। सबसे चिंताजनक स्थिति यह है कि कई सरकारी और निजी स्कूलों के आसपास ऐसी दुकानें सक्रिय हैं जहां बच्चों की आवाजाही सामान्य बात है। छुट्टी के समय या कोचिंग के बाद यही स्थान गलत संगत और नशे की पहली सीढ़ी बनते जा रहे हैं। सवाल यह नहीं कि कानून मौजूद है या नहीं, सवाल यह है कि जमीनी स्तर पर उसका असर क्यों नहीं दिख रहा। जिले के प्रमुख बस स्टैंड और बाजार क्षेत्र ऐसे स्थान हैं जहां दिन-रात भीड़ रहती है, इसके बावजूद यहां नियमित निगरानी और जांच का अभाव साफ नजर आता है। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि यदि इन इलाकों में सख्त और लगातार निगरानी हो तो नाबालिगों तक नशे की पहुंच काफी हद तक रोकी जा सकती है। मौजूदा हालात स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न खड़ा करते हैं कि क्या स्कूलों के आसपास की दुकानों पर नियमित निरीक्षण हो रहा है, क्या बस स्टैंड और सार्वजनिक स्थानों को लेकर कोई विशेष निगरानी व्यवस्था प्रभावी है और क्या नाबालिगों को नशे से बचाने के लिए पुलिस, प्रशासन, शिक्षा विभाग और समाज के बीच समन्वय पर्याप्त है। यह सवाल किसी व्यक्ति या विभाग पर सीधा आरोप नहीं, बल्कि व्यवस्था की प्राथमिकताओं और संवेदनशीलता पर गंभीर मंथन की मांग करते हैं। आज का नाबालिग कल का नागरिक है, यदि वही पीढ़ी नशे और जुए की गिरफ्त में फिसलती गई तो इसका असर केवल परिवार तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि समाज, अपराध और प्रशासन तीनों पर पड़ेगा। यह वह समय है जब सख्ती से पहले सजगता और कार्रवाई से पहले स्पष्ट नीति की जरूरत है। समस्तीपुर के लिए यह केवल एक खबर नहीं, बल्कि चेतावनी है कि यदि अभी भी स्कूलों, बस स्टैंड और सार्वजनिक स्थलों को लेकर ठोस और दिखाई देने वाली पहल नहीं हुई तो आने वाले समय में यह समस्या और विकराल रूप ले सकती है। प्रश्न सीधा है—क्या हम हालात बिगड़ने के बाद कदम उठाएंगे या अभी सोचकर भविष्य को बचाएंगे।

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